मौत के ब्रम्ह गोदन का सच



लगता है चारों दिशाएँ अँधेरे ने निग़ल लिए हो, हवा के झोंकों से सरसराते पत्तियाँ कानों में हलके से कुछ कहना चाहती हो। सर्द ठंडी में घास के तिनके सिकुड़ने लगे, रातरानी के फूल गूंगे हो जाएं, पहाड़ों पर गूँजने वाली आवाज़ अचानक ख़ामोश हो जाए। आसमान के सुनहरे देह पर बिख़रे हुए काले बादलों से झाँकता हुआ चाँद का टुकड़ा कहीं छुप जाए। कोयल ने गाणा गाना बंद किया हो।  सागर ने अपनी मन की बात बताना बंद कर दिया हो, उसके किनारे से लगे नारियल के पेड़ों ने अपना बदन चुरा लिया हो और ऐसे नीरव ख़ामोशी में जब श्वान अपना मुँह ऊपर करके किसी को पुकारते है तब मौत नाम के अंतिम सत्य कि गूँज आसपास लहराने लगती है। हर इंसान ऐसी गूँज का अनुभव अपने जीवन में जरुर करता है। क्या मौत का भी कोई वास्तविक अनुभव होता है ? मेरे माथे पर लगे इस मौत के ब्रम्ह गोदन का सच मै भी अनुभव करना चाहता हु।

  

लोग कहते है "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" ! अगर ये दुनियाँ झूठ है तो फिर सच क्या है ? माया का बाज़ार या मोह कि बेड़ी ? आदमी क्यों पैदा होता होगा ? क्यों जिंदगी जीता होगा ? क्यों आदमी मरता होगा ? मरने के बाद वो कहाँ जाता होगा ? ये सारे सवाल मै एकांत के शमशान में अनुभव करता रहता हु। मै अक्सर दूसरों से भी सच जानने की कोशीश करते रहता हु कि शायद कही से कोई इशारा मिल जाएं, पर सब कुछ ख़ाली-ख़ाली, सूखा-सुखा, बहते पानी में उतर जाने के बाद भी बदन सूखा ही रहे, वैसे ही। 


बस कुछ मिनिटों पहले इस दुनियाँ में आया हुआ मांस का गोला अपनी आँखे खोलने से पहले ही इस दुनियाँ से बिदा ले लेता है। अगर बच्चा जीवित ही ना  रहे यही विधाता कि मर्ज़ी होगी तो वो उन्हें इस दुनियाँ में पैदा ही क्यों करता होगा ? मैंने सुना है, इंसान का जीवन पाने के लिए दुनियाँ के जीवों को चौरासी लक्ष योनियों का सफ़र पार करना पड़ता है, अगर ये इस चक्र का वर्तुल होगा तो भाग्य किसका ? उस बच्चे का, उस पैदा किये हुए माँ का या जिसने जन्म के बीज बोयें उस पिता का ? अपने हथेली पर मरे हुए मांस के गोले को फूलों जैसा सँभालते हुए; अपने आँसुओं को ओस कि बूंदों सा छिड़कते हुए, अपने कांधे पर लेकर जब वो शमशान में आता है; अपने ख़ुद के हाथों से उस बच्चे के चिरनिंद्रा के लिए गड्ढा खोदता है और ऊपर से उस पर एक बड़ा सा पत्थर भी रखता है।  इसे कौन सा सत्य कहेंगे ? सच क्या है, उस बच्चे का जन्म ? उस बच्चे की मौत ? बाप का गड्डा खोदना ? या उस माँ का जो अभी पैदा हुए बच्चे को दफ़नाने के लिए अपनी गोद सुनी कर ले ?  ऐसे अनगिनत सवाल है जो सच के परे है। 


आत्महत्या किये हुए किसी व्यक्ति की मौत का क्या सच अलग होता होगा ? किसी भी बच्चे की, बुज़ुर्ग कि या किसी भी व्यक्ति की मौत जब उसके रिश्तेदार स्वीकार करते है, भरी दोपहर में जब सूरज आग उगलते रहता है, सारी धरती को जलाते रहता है उस वक़्त ये ही रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी पेट्रोल, रॉकेल का अभिषेक करते हुए मरे हुए कि चिता को जलाते है ? क्या सच है - उस व्यक्ति का पैदा होना ? उसका जीवन से हार जाना ? या अपने शरीर के साथ आत्मा का भी दहन होते देखना ? या अब तक क्यों जिए इस सवाल का जबाब ढूढ़ने के लिए उसका इस दुनियाँ से बिदा हो जाना ?


जिंदगी भर अपने गले में तुलसी की माला पहनकर अपना पावित्र्य जपने वाले, भगवान की भक्ति करने वाला हरिभक्त हो या रास्ते पर भिक माँगकर पेट भरने वाला कोई भिकारी हो, अपना प्राण त्याग कर जब वो पड़ा रहता है मृत तब क्या सत्य होता होगा ? उसका मृत हो जाना या जिन्दा रहना ? क्या कभी उन्हें भी अपने आख़री वक्त पर ये ख़याल आता होगा कि मैं क्यों पैदा हुआ और किसलिए इतने सालों तक जिंदा रहा ? उनके लिए सत्य क्या होता होगा - जीना या मरना ?

 

ऐसी मौते जब मै खुद अनुभव करता हु, तब मै शमशान से घर आकर अपने घर के कोने में बैठकर चारों दीवारों का अँधेरा ओढ़ लेता हु।  मेरे आसपास वही जीवन - मृत्यु का घेरा मंडराते रहता है।  मै फ़िर सोचने लगता हु कि सच में जन्म लेने का औचित्य क्या होता होगा ? आख़िर में क्या उपयोगिता रहती है जीवन की ? जन्म लेकर भी हम आख़िर करते क्या हैं ? सिर्फ़ जीते रहते है या कैसे तो भी जीवन काटते रहते है मौत आने तक। जन्म से लेकर मौत आने तक के समय को ही हम अपनी जिंदगी समझते रहते है। मेरी ये धारणा है कि, जो जन्म हमारे हाथ में नहीं, जो मौत हमारे हाथ नहीं, उस के बिच का हिस्सा, उस बिच का जीवन कैसे हमारा हो सकता है ?

 

इस सत्य को जानने के लिए, समझने के लिए मै दोनों पैरों पर अपने पेट को टांग कर उम्रभर दौड़ते रहता हूँ। अपने माथे पर लिखवाकर लाये हुए ब्रम्हसत्य को लेकर, जिस दिशा में कहें उस दिशा की और.. . . ... . . . . .! कभी गिरता हु, कभी ठोकर खाता हु, कभी ख़ुद को संभाल लेता हु, फिर से दौड़ता रहता हु।  जब रुकता हु तब मेरी आख़री साँसे मेरे चारों और भटकते रहती है। शुष्क हो चुके मेरे  शरीर की रेखाओं को खिंचते हुए जब मै अपनी आख़री साँस छोड़ता हूँ तब अचानक पल के हजारवें हिस्से में मुझे उस महाब्रम्ह सत्य का अनुभव होने लगता है। मै उस महाब्रम्ह सत्य को जानने के लिए, उसका गहरा अनुभव करने के लिए उसकी और सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ता हु उनका आलिंगन करने के लिए। 


उस महासत्य का आलिंगन मुझे धीरे धीरे पिघला देता है। फिर दूसरे किसी साँचे में बिठाने के लिए। फिर से किसी दूसरे यात्रा के लिए। उधर मेरी नयी यात्रा की शुरुवात होने लगती है। यहाँ लोग अब मुझे मिटाने की कोशीश में लग जाते है और एक दूसरे से पूछते है "आदमी क्यों जन्म लेता है, आदमी किस लिए जीता है" ? मै ख़ामोशी से सब सुनते रहता हु और अपनी अनजान यात्रा के सफ़र पर निकल पड़ता हु उसी सच को दोहराने के लिए. . . . . . . .।  

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