यूँ तो मिलने को हम मिले है बहोत

यूँ तो मिलने को हम मिले है बहोत 


कही दूर से कोयल का गीत कानो पर पड़ते ही मुझे तेरा गुनगुनाना याद आता है। कोयल की वो कुहु कुहू सुनते ही मेरे कानो में दिल जमा होने लगता है और मन के किसी खाली कोने में वीणा के तार झंकारने लगते है। कोयल की कुहू कुहू से और पंछियों की चहचहाट से मै नींद से जाग जाता हु और युही सुनसान रास्तो पर तेरी यादों के साथ निकल पड़ता हु। लगता है जैसे तेरी यादों का मौसम फिर से लौट आया हो। रास्ते के किनारे पर खड़े आम और इमली के पेड़ पर फलों के मौसमी बहार छाई हुयी है। कभी उन्ही पेड़ो के खाये हुए फलों का स्वाद अब भी दिलो  दिमाग पर छाया हुआ है।  क्या तुम्हे अब भी वो स्वाद याद है ?       


दूर पहाड़ी पर सूरज की लाली फैल रही है, चलते हुए जब मै पीछे मुड़कर देखता हु  तो सारी हरियाली सूरज की रौशनी में सोने जैसी चमक रही होती है और झरने से बहते हुए पानी के स्वर्ण तुषार अपने हातो में समेट ने लिए मन दौड़ पड़ता है। तुम्हारा मन भी तो कभी ऐसे ही दौड़ पड़ता था ये सब अपने यादों की गहराई  में समेटने के लिए । उसी रास्ते के किसी मोड़ पर खड़ा नीम और सोनचाफा का पेड़ अब मौसमी फूलों से भर गया है। चिलचिलाती हुयी गरमी के सुर्ख मौसम में अचानक हुई बारिश से चाफा के सारे फूल जमीं पर बिखर पड़े है, किनारो पर मानो सफ़ेद चादर बिछाई हो किसीने। ऐसे ही किसी मौसम में अचानक हुई बारिश मे हम तुम दोनों इसी चाफा के निचे भीग गए थे, क्या अब भी तुम्हे वो मेरे साथ भीगना याद आता है ? 


पहाड़ी और झरने के पीछे तालाब पर पंछियों का झुंड उतरने लगता है , दूध सी सफेदी लिए हुए बगुले की कतार नीले आसमान पर छाई हुयी है। जेठ की तपती धुप में दूर कही किसी घर की चारदीवारी से सट कर खड़ा गुलमोहर अपने सुर्ख लाल फूलों से खिला हुआ है । मौसम की धूप ऐसी है कि मानो आग  बरस रही हैं, इंसान तक जल रहा है उस आग में और गुलमोहर है कि सन्नाटे के क्षणों में भी चुपचाप खिलते हुए खिलखिलाता है।  उसे खिलखिलाता हुआ देख कर मेरे मन के मौसम भी अब गुलमोहर से हो गए है।  मुझे अक्सर तुम्हे गुलमोहर नाम से पुकारने का मन होता है।  नाम भी तो कई सजाये है आजकल लोगो ने गुलमोहर के - रास्ते, घर, होटल, गली और मुहल्ले  भी । क्या तुम्हे अब भी वो गुलमोहर याद आता है ?


नंगे बदन जैसे दिखने वाले पहाड़ी पर अचानक रात को हुयी बारीश से कुछ हरियाली फिर से अंकुरीत हो रही है। बारिश का मौसम आने से ये सारा पहाड़ी इलाका फिर से हरा भरा हो जायेगा।  इसी पहाड़ी के ढलान पर तुम्हांरे पसंद का आम का पेड़ अब काफी बड़ा हो गया है।  मै अक्सर उस पेड़ के निचे बैठकर पल भर की नींद लेना चाहता हु, लेकिन ऐसा कुछ होता ही नहीं है। पहले भी कुछ ऐसा ही होता था, अब भी तो सब वैसे ही हो रहा है।  हां, लेकिन आम के पेड़ पर उस वक्त जो बहार मन को छू जाती थी, अब वो बहार कही खो गयी है। जिस बादलों ने पहाड़ी पर हल्की सी हरयाली बिखेरी थी उन्ही काले बादलो ने आम का सारा बहार जमी पर बिखेर दिया। ऐसे बेदर्द नजारो को देख कर कलेजा चीर जाता है। जेठ के महीने में अचानक हुयी बारीश की बूंदो को जब भी छूने की कोशिश करता हु, तेरे बारिश में भीगने की यादे  याद आती है।  भिगोये बिना रूठ कर जाने वाली बारिश भी कहाँ भूल पाया मै। तूफानी बारिश में बदन जरूर भींग गया लेकिन मन पूरी तरह से तार-तार हो गया। मुझे तार-तार करने में उसने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे बेमौसम बारिश की बौछारे अब मन को कांटे जैसी चुभती है। हो सकता हो बादलों का मन भी कही आँसूवो से भर आया हो; हो सकता हो उसके आंसू ज्वार-भांटा जैसे आँखों में आगे पीछे हो रहे होंगे। पर कुछ दर्द के आँसूवो को चाह कर भी नहीं रोका जाता, उन्हें बरसनाही पड़ता है। क्या तुम्हे वो अचानक हुयी बारीश याद आती है ? 


अब भी वही मौसम है; वही हमेशा होने वाले बदलाव है, अब भी वही इशारे है; अब भी वही दर्द है। सभी कुछ है जो तुम्हे शायद याद होगा, लेकिन सब तुम्हारे बगैर।  जिंदगी में कभी कभी अचानक कोई अनजाना हमसफ़र बन कर मिलता है और सफर सुरु होता है।  धीरे धीरे पहचान बढ़ती जाती है फिर सोच से परे दो रास्ते के सुर जुळने लगते है। समय के साथ साथ पहचान दोस्ती में कब बदल जाती है पता ही नहीं चलता। दोस्ती के इस अनजाने सफर पर बार बार चलने का दिल करता है।  दोनों में से किसी के अँधेरे जीवन में चाँदनी सी रोशनी बिखेर जाती है। हमेशा रुलाने वाले मौसम हसते हुए फूलों की बहार लेकर आते है। जिंदगी अचानक महक जाती है। लेकिन तक़दीर के भी अजीब फसाने है। दिल में भावनाओ का तूफान सा उठने लगता है और ऐसे वक्त पर ही सफर ख़त्म होने को आता है।  अब तक दिल में घर बनाकर बसा हुवा कोई अपने दूसरे सफर के लिए निकल पड़ता है। सफर पर जाने वालों को तो हसते हुये ही बिदा किया जाता है, यही रीत है, यही दस्तूर है। हालाँकि बिदा करते समय भरा हुवा मन खाली करने जो बहुत जी करता है लेकिन तब तक हमसफ़र चार कदम दूर निकल चूका होता है। बड़े होशियारी से चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर, एक हाथ ऊँचा करके उसको बिदा करने के सिवा और कुछ सूझता ही नहीं। व्याकुल मन के विरह के बादल अब छप्पर से टपकने वाले बारीश की बूंदो जैसे टपकने लगते है।  क्या तुम्हे अब भी वो विरह के बादल याद आते है ?



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