हम नकली हंसी में हंसते हैं।

बहुत लोग इस दुनिया में ऐसे भी है जो सोचते है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। और इस बारे में परेशान होने से खुद पर यकीन खोने लगते हैं। जब कि सच्चाई यह है की कोई आपको नहीं सोचता, कोई आपकी फ्रिक नहीं करता। हम इस दुनिया में दूसरों को खुश करने के लिए पैदा नहीं हुए। हमको ये ज़िंदगी खुद को ज़ाहिर करने के लिए मिली है, दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं । हम सभी ने वही व्यक्ति बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए जो वास्तव में हम है। मेरा अनुभव है और मैंने लोगो को देखा है कैसे लोग बनावटी चेहरे लेकर दुसरो से मिलते है।  दूसरों की रज़ामंदी और पसंदगी की चाह में खुद को मत खोइए । अपनी कुल जमा 70–80 साल की ज़िंदगी में किसी भी बात पर हर किसी व्यक्ति की राय लेने के लिए हमने अपना कीमती समय क्यों बर्बाद करना चाहिए? हर किसी आते-जाते, राह-चलते व्यक्ति की स्वीकृति क्यों लेना चाहिए ? हम जो भीतर से नहीं हैं वह बनने के लिए जिंदगी के बेशकीमती लम्हे क्यों खो देना? जो पैसे हमारे पास नहीं हैं उनसे हम वे चीज़ें खरीदते हैं जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है ताकि हम उन लोगों को इंप्रेस कर सकें जिन्हें हम पसंद नहीं करते। 


लेकिन यह बात हमें चीज़ें खरीदने से नहीं रोकती। हम चीज़ों को पसंद करते हैं ताकि हम लोगों से जुड़े रहें। हम वो सभी दिखावे की चीजें करते है जिसका हमारे वास्तविकता के साथ कोई संबंध नहीं होता। हम नकली हंसी में हंसते हैं। हमने हमेशा अपने आप को दुनिया की भीड़ का हिस्सा मान लिया है। दुनिया क्या करती है हमें इस बात की बड़ी फ़िक्र होती है, लेकिन हम ख़ुद क्या चाहते है इसकी कोई फ्रिक नहीं करता, हम खुद भी नहीं। कोई फिक्र भी करता होगा तो किसी मतलब के लिए होगा। दुनिया के फिक्र से हम इतने डरे हुए है कि हम इस डर से सच नहीं कहते कि कहीं यह दूसरों को असहज न कर दे या उनके मन में हमारे काल्पनिक छवि को तार -तार न कर दे।  लेकिन आप ऐसे सभी लोगों से मिलिए, आपको जानकर हैरानी होगी कि ये सब इन सबसे उबर गए है। अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए ख़ुद कि समझ होनी चाहिए। खुद के जीवन कि फिक्र होनी चाहिए। ख़ुद कि फिक्र करने के लिए दुनिया कि भिड़ से खुद को अलग रखना होता है। जीवन में एक बार भी अगर हम दुनिया कि भीड़ में शामिल होने से इंकार करेंगे उस दिन हम अपने आप को रूपांतरित होते हुए पाएंगे। अब आप दूसरों के साथ रहते वक्त वही व्यक्ति होंगे जो आप भीतर है। यदि कोई आपको या आपका साथ पसंद नहीं करता तो भी आपको  इससे  कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला। इससे हमको हमारे सोशल सर्किल को छोटा करके उन लोगों का साथ पाने में मदद मिली है जो हमारे व्यक्तित्व के साथ मेल खाते हैं। मैं हमेशा ऐसे लोगों के साथ रहता हु जिनके साथ मैं बहुत खुल पाता हूं और जब उनके साथ कभी मेरा मेल नहीं बैठता तो  एक शब्द भी बोलने के बजाय मै ख़ुद को दरकिनार करके शांति से दूर हो जाता हु।  इसमें किसी दूसरे को गाली देने का या दुसरो को बुरा कहने का सवाल नहीं। हमने अपनी खुद की फिर्क कि बस इतना काफ़ी है। 


जीवन को बस ऐसे ही जीना चाहिए। यही सफ़ल जीवन के राज है। जीवन कि सफ़लता के राज हमारे खुद के भीतर छुपे हुए है। कोई दुनिया हमें सफलता नहीं दिला सकती जब तक हम ख़ुद को सफल ना समझे। जीवन कि सफलता का मतलब दुसरो को खुश करना नहीं। अगर हम  दुनिया को खुश करने में लगे है तो हमारी खुद कि क़ीमत क्या है ? दुनिया में हर चीज़ कि क़ीमत है, होनी भी चाहिए। हम को खुद भी अपनी क़ीमत तय करते आनी चाहिए। अगर हमको अपनी खुद की क़ीमत पता नहीं है इसका मतलब दुनिया से विदा होते समय हम दो कौड़ी के रहेंगे। हम पूरी जिंदगी अपनी खुद कि कीमत नहीं लगा सके इससे बड़ी असफलता और क्या होगी ? हम पूरी जिंदगी इस बात कि भी फिक्र नहीं कर सके और हमें लगता है हम एक सफल जीवन जी रहे है। क्या अब भी आपको लगता है आप सफल जीवन जी रहे है ? हो सकता हो, जीवन के सफलता कि व्याख्या सबकी अपनी अपनी हो। और सच तो यही है कि व्याख्या खुद की ही होनी चाहिए। जीवन का हर एक क्षण, हर एक दिन जुगार के पत्ते के खेल जैसा है। रोज नए पत्ते हमारे हिस्से में आते है। जीवन का कितना भी हिस्सा हमने जी लिया हो उस पुरे जीवन को एक बार हो सके उतने यादों के साथ पीछे मुड़ कर देखिये। बिताया हुआ एक एक दिन याद करने की कोशिश करीए। जिस दिन को, जिस क्षण को आपने ख़ुशी से जिया और अगर फिर से आपको एक मौका मिले उसी क्षण को जीने का, तो आप क्या आप एग्झॅक्टली वैसे ही जियेंगे ? और आप चाहते है के बिलकुल वैसे ही जीने का मौका मिले, तो वो दिन आपकी सफलता का दिन रहा होगा। और अगर आपको लगता है कि उस दिन आप कुछ और नया और अच्छा कर सकते थे लेकिन आप नहीं कर पाए तो वो दिन आपकी असफलता का दिन रहा होगा। जितना ज्यादा हमें अपने बिताये दिनों को अल्टर करने की जरुरत महसूस होती है उतने ही हम असफल होते है। 


जीवन की सफलता किसी एक दिन हासिल नहीं होती। उसे रोज हासिल करना होता है। जीवन कि लड़ाई रोज लढ़नी पड़ती है। जीवन में हार जीत के दांव रोज लगते है। ये हम पर निर्भर करता है कि हमारी कीमत क्या है ? आखिर दांव पर लगाने को कुछ तो क़ीमत का चाहिए। सवाल किसी चीज़ के बुराई का नहीं है, सवाल है की क्या हम सच में हमारे विचार, सोच  के खिलाफ जाएगे? उस सोच के खिलाफ जो दुनिया ने हमें सिखाई है। ये बिलकुल कुछ इस तरह है की हम सभी मानते और चाहते है की भगवान को कैसा होना चाहिए लेकिन हम स्वयं भी भगवान है इस धारणा को हमेशा नकारते है। लेकिन हमारा ऐसा सोचना भी दुनिया के लिए पाप है। अगर ये गलत भी अगर हो तो पाप उस व्यक्ति को होगा, और अगर सही है तो पुण्य भी उसी को मिलेगा। लेकिन हमारी दुनिया ऐसी है जहां अवधारणा की भी जाँच परख भी करना गुनाह है। बिना किसी असफलता के हमारे पास किसी विकल्प का कोई अनुभव नहीं होगा। यह हमें उस प्रश्न का उत्तर देने से रोकता है जिसका उत्तर हम नहीं जानते होंगे । यही हमारा बनावटी जीवन  हमें अपने अच्छे और बुरे की भावना को आधार बनाने से रोकता है। किसी भी चीज़ पर हम निरीक्षण नहीं कर सकते लेकिन हम अपने निर्णयों का परीक्षण ज़रुर कर सकते हैं। हम हवा को बहने से नहीं रोक सकते या गिरने वाली बारिश को मना नहीं कर सकते। हमारे साथ जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में स्वयं महसूस करना, बजाय इसके के दूसरे बताये। दुसरो का ज्ञान हमारी प्रज्ञा नहीं हो सकती। खुद की प्रज्ञा खुद के जीवन को बदलने से ही मिलती है। खुबसूरत, मूल्यवान जीवन की व्याख्या यही है की हम अपने जीवन को स्वयं के अनुभवों से जांचे। हमारी आंतरिक शक्ति, जो संभव है उसके लिए खुद को समायोजित कर लेती है। इसे किसी विशिष्ट सामग्री की आवश्यकता नहीं है। 

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