![]() |
| अंधे आदमी की जिज्ञासा |
साथियों, भगवद गीता का प्रथम अध्याय जो
संशय -विषाद योग अथवा अर्जुन विषाद योग से भी जाना जाता है। जहां युद्ध के परिणाम पर
शोक दिखाया गया है। श्रीकृष्ण जिस स्तर की बात करते है, उसी स्तर पर खड़ा होनेवाला कोई
महापुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा की श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस
समय उनके मनोगत भाव क्या थे। उसी अवस्था को
प्राप्त महापुरुष ही जानता है की गीता क्या कहती है। फिर वह गीता की पंक्तियाँ नहीं दोहराता, बल्कि उनके
भावों को भी दर्शाता है, क्योंकि जो दृश्य कृष्ण के सामने था, वही वर्तमान महापुरुष
के समक्ष भी है। श्रीकृष्ण ने किसी अन्य सत्य
को नहीं बताया बल्कि कहा - ऋषिभिर्बहुधा गीतम्
मतलब ऋषियों ने अनेको बार जिसका गायन किया है, वही कहने जा रहा हु। उन्होंने यह नहीं कहा की उस ज्ञान को केवल मै ही
जानता हु या मै ही इस ज्ञान को बताऊंगा बल्कि कहा - "किसी तत्वदर्शी' के पास जाओ। निष्कपट भाव से उस ज्ञान को प्राप्त करो।
भगवद्गीता
का
उपदेश
एक
ही
वंश
के
दो
चचेरे
भाइयों
कौरव
और
पाण्डवों
के
बिच
हुए
महाभारत
युद्ध
की
रणभूमि
पर
दिया
गया।
भगवद्गीता
का
प्रारंभ
राजा
धृतराष्ट्र
और
उसके
मंत्री
संजय
के
वार्तालाप
से
होता
है।
चूंकि
धृतराष्ट्र
नेत्रहीन
था
इसलिए
वह
व्यक्तिगत
रूप
से
युद्ध
में
उपस्थित
नहीं
हो
सका।
अत:
संजय
उसे
युद्धभूमि
पर
घट
रही
घटनाओं
का
पूर्ण
सजीव
विवरण
सुना
रहा
था।
संजय
महाभारत
के
प्रख्यात
रचयिता
वेदव्यास
के
शिष्य
थे।
ऋषि
वेदव्यास
अपनी
अलौकिक
शक्ति
के
द्वारा
सुदूर
प्रदेशों
में
घट
रही
घटनाओं
को
प्रत्यक्ष
रूप
से
देखने
में
समर्थ
थे।
अपने
गुरु
की
अनुकंपा
से
संजय
ने
भी
दूरदृष्टि
की
दिव्य
चमत्कारिक
शक्ति
प्राप्त
की
थी।
इस
प्रकार
से
वह
युद्ध
भूमि
में
घटित
सभी
घटनाओं
को
दूर
से
देख
सका।
राजा धृतराष्ट्र
जन्म
से
नेत्रहीन
होने
के
अतिरिक्त
आध्यात्मिक
ज्ञान
से
भी
वंचित
था।
अपने
पुत्रों
के
प्रति
अथाह
मोह
के
कारण
वह
सत्यपथ
से
भटक
गया
था
और
पाण्डवों
के
न्यायोचित
राज्याधिकार
को
हड़पना
चाहता
था।
अपने
भतीजों
पाण्डव
पुत्रों
के
प्रति
उसने
जो
अन्याय
किया
था,
उसका
उसे
भलीभांति
बोध
था।
इसी
अपराध
बोध
के
कारण
वह
युद्ध
के
परिणाम
के
संबंध
में
चिन्तित
था।
इसलिए
धृतराष्ट्र
संजय
से
कुरुक्षेत्र
की
युद्धभूमि
जहाँ
युद्ध
होने
वाला
था-की घटनाओं
के
संबंध
में
जानकारी
ले
रहा
था।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |
मामकाः
पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||1||
गीता की यह अदभुत कथा एक अंधे आदमी की जिज्ञासा
से
शुरू
होती
है।
अंधा
आदमी
भी
देखना
चाहता
है
उसे,
जो
उसे
दिखाई
नहीं
पड़ता;
बहरा
भी
सुनना
चाहता
है
उसे,
जो
उसे
सुनाई
नहीं
पड़ता।
सारी
इंद्रियां
भी
खो
जाएं,
तो
भी
मन
के
भीतर
छिपी
हुई
वृत्तियों
का
कोई
विनाश
नहीं
होता
है।
धृतराष्ट्र
आंख
से
अंधे
हैं।
फिर
भी
संयमरूपी
संजय
के
माध्यम
से
वह
देखता
है,
सुनता
है
और
समझता
है
की
परमात्मा
ही
सत्य
है।
गीता हमें ये सिखाती
की
सिर्फ
आंख
के
न
होने
से
वासना
नहीं
मिट
जाती।
हमारा
शरीर
एक
ऐसा
क्षेत्र
है
जहां
दैवी
संपत्ति
का
बाहुल्य
होता
है
तो शरीर धर्मक्षेत्र
बन
जाता
है
और
जब
इसमें
असुरी
संपत्ति
का
बाहुल्य
होता
है
तो
यह
शरीर
कुरुक्षेत्र
बन
जाता
है। श्रीकृष्ण
कहते
है
- प्रकृति
से
उत्पन्न
तीनों
गुणों
द्वारा
परवश
होकर
मनुष्य
कर्म
करता
है।
वह
क्षणमात्र
भी
कर्म
किये
बिना
नहीं
रह
सकता। जब
तक
प्रकृति
और
प्रकृति
से
उत्पन्न
गुण
जीवित
है,
तब
तक
'कुरु
लगा
रहेगा।
इसलिए
श्रीकृष्ण
ने
अर्जुन
से
कहा
था
- 'इदं
शरीरं
कौन्तेय
क्षेत्रमित्यभिधीयते'। मतलब - यह शरीर ही क्षेत्र
है
और
जो
इसको
जानता
है,
इसको
पार
पा
लेता
है,
वह
क्षेत्रज्ञ
है।
इस श्लोक में धृतराष्ट्र
ने
संजय
से
यह
प्रश्न
पूछा
कि
उसके
और
पाण्डव
पुत्रों
ने
युद्धभूमि
में
एकत्रित
होने
के
पश्चात्
क्या
किया?
अब
यह
एकदम
स्पष्ट
था
कि
वे
युद्धभूमि
में
केवल
युद्ध
करने
के
उद्देश्य
के
लिए
एकत्रित
हुए
थे।
इसलिए
यह
स्वाभाविक
ही
था
कि
वे
युद्ध
करेंगे।
धृतराष्ट्र
को
ऐसा
प्रश्न
करने
की
आवश्यकता
क्यों
पड़ी
कि
उन्होंने
युद्धभूमि
में
क्या
किया?
धृतराष्ट्र
आशंकित
था
कि
कुरुक्षेत्र
की
पावन
धर्म
भूमि
के
प्रभाव
के
परिणामस्वरूप
उसके
पुत्रों
में
कहीं
उचित
और
अनुचित
में
भेद
करने
का
ऐसा
विवेक
जागृत
न
हो
जाए
कि
वे
यह
सोचने
लगें
कि
अपने
स्वजन
पाण्डवों
का
संहार
करना
अनुचित
और
धर्म
विरूद्ध
होगा
और
कहीं
ऐसा
विचार
कर
वे
शांति
के
लिए
समझौता
करने
को
तैयार
न
हो
जाएं।
इस
प्रकार
की
संभावित
आशंकाओं
के
कारण
धृतराष्ट्र
के
मन
में
अत्यंत
निराशा
उत्पन्न
हुई।
वह
सोचने
लगा
कि
यदि
उसके
पुत्रों
ने
युद्ध
विराम
या
संधि
का
प्रस्ताव
स्वीकार
किया
तो
पाण्डव
निरन्तर
उनकी
उन्नति
के
मार्ग
में
बाधा
उत्पन्न
करेंगे।
साथ
ही
साथ
वह
युद्ध
के
परिणामों
के
प्रति
भी
संदिग्ध
था
और
अपने
पुत्रों
के
उज्ज्वल
भविष्य
के
प्रति
सुनिश्चित
होना
चाहता
था।
इसलिए
उसने
संजय
से
कुरुक्षेत्र
के
युद्धस्थल
में
हो
रही
गतिविधियों
के
संबंध
में
पूछा।
जहाँ
दोनों
पक्षों
की
सेनाएं
एकत्रित
हुई
थीं।
धृतराष्ट्र
अंधे
हैं,
लेकिन
युद्ध
के
मैदान
पर
क्या
हो
रहा
है,
मीलों
दूर
बैठे
उनका
मन
उसके
लिए
उत्सुक
है,
जानने
को
आतुर
है।
इस
अद्भुत
कथा
में
दिखाया
गया
है
की
सिर्फ
धृतराष्ट्र
ही
अंधे
नहीं
है
बल्कि
धृतराष्ट्र
से
जन्मे
हुए
सौ
पुत्र
सब
तरह
से
अंधा
व्यवहार
कर
रहे
थे।
आंखें
उनके
पास
थीं,
लेकिन
भीतर
की
आंख
नहीं
थी।
एक
अंधा
पिता
अपने
उन्ही
बेटों
के
उस
अंधेपन
को
जानने
को
उत्सुक
था
की
युद्ध
के
मैदान
में
क्या
हो
रहा
है
।
धृतराष्ट्र
कहते
हैं,
धर्म
के
उस
कुरुक्षेत्र
में
सभी
युद्ध
के
लिए
इकट्ठे
हुए…। लेकिन कोई धर्म के लिए युद्ध में कैसे इकट्ठे
हो
सकते
है
? क्योंकि
वहां
सभी
एक-दूसरे को काटने को आतुर थे। यही गीता का प्रांरभ
है,
क्योकि
अगर
धर्मक्षेत्रों
में
क्या
होता
है
इसका
हिसाब
लगाना
मुश्किल
है
तो
अधर्मक्षेत्रों
में
क्या
क्या
होता
होगा
इसका
भी
हिसाब
लगाना
मुश्किल
है।
और
धृतराष्ट्र
संजय
से
यही
जानना
चाहते
है
की
वहां
युद्ध
के
लिए
आतुर
मेरे
पुत्र
और
उनके
विरोधियों
ने
क्या
किया
है
? क्या
कर
रहे
हैं
? युद्ध
के
मैदान
में
जहां
दोनों
की
सेनाएं
आमने
सामने
खड़ी
थी,
जहां
लोग
एक
दूसरे
से
लड़ने
को
ही
इकट्ठे
हुए
थे।
असल में महाभारत
का
युद्ध
सिर्फ
कौरव
और
पांडवों
तक
ही
सिमित
था
ऐसा
नहीं
।
युद्ध
की
आकांक्षा
सारी
मनुष्य
जाती
के
दिमाग
में
गहराई
में
बसी
है।
ये
युद्ध
सिर्फ
उस
समय
का
युद्ध
का
वर्णन
नहीं
है,
ये
उस
हर
समय
के
युद्ध
का
चित्रण
है
जब
तक
मनुष्य युद्ध
की
पिपासा,
विंध्वस,
विनाश
की
लालसा
लेकर
जियेगा।
हम
सब
मनुष्यों
में
जो
एक
जंगली
पशु
छिपा
होता
है,
जो
हमेशा
छोटे
-मोटे
लड़ाईया,
झगडे
में
दिलचस्पी
रखता
है,
भगवद
गीता
उसी
का
दर्पण
है।
इतने बड़े युद्ध में कृष्ण
जैसा अद्भुत आदमी भी मौजूद था वो भी एकदम तठस्थ।
धृतराष्ट्र का
अंधापन
सिर्फ
उसके
लिए
ही
नहीं
था। हम
सभी
उसी
अंधेपन
से
जीते
है,
क्योंकि
जिसके
पास
आँखे
है
वो
क्यों
किसी
दूसरे
से
अपनी
जिज्ञासा
मिटाना
चाहेगा।
असल
में
धृतराष्ट्र
का
अंधापन
हम
सब
का
अंधापन
है।
#bhagavadgita #arjunvishadyog #krishnavani #spiritualgrowth #geetagyan #lifelessons #innerbattle #mindsetshift #sanatandharma #selfrealization
bhagavad gita chapter, 1 explained in hindi, arjun vishad yog explanation dhritarashtra blindness meaning kurukshetra meaning in hindi geeta gyan motivational video spiritual awakening hindi krishna arjun dialogue explanation life lessons from bhagavad gita inner battle meaning gita self realization hindi
arjun vishad yog,arjun vishad yog bhajan,chapter 1 arjun vishad yog,arjun visad yog,arjun vishad yog mahabharat,arjun vishad yog explanation,bhagwat geeta arjun vishad yog,arjun vishad yog bhagwat geeta,arjuna vishada yogam,bhagwat geeta arjun vishad yog in hindi,bhagwat geeta arjun vishad yog reciting,arjun vishad rap song,#arjunavishadyog

No comments:
Post a Comment