हमारा जीवन हमेशा किसी न किसी पीड़ा, दर्द, तकलीफों से गुजर रहा है। क्योंकि हमने सब कुछ पता लगा लिया है, सिर्फ इस बात को छोड़कर की जीना कैसे है ? हमारा जीवन कभी बेहतर नहीं हो सकता, जब तक हम खुद बेहतर बनने की चेष्टा न करे। हमारे पीड़ित जीवन के लिए हम स्वयं जिम्मेवार है, जो हम वास्तव में है। हम ये कभी जानना ही नहीं चाहते की हम असल में चाहते क्या है। और अब हम जो है, उसके स्वयं जिम्मेवार है, यही तथ्य है। हम इसलिए भी दुखी नहीं है की हमारा जीवन पीड़ा से भरा है, बल्कि इसलिए की हम मुक्त होने की निंदा करते है। हममें से बहोत लोगो का जीवन बिना किसी अर्थ के ही बीत जाता है। ये माना की हमारे जीवन का निश्चित कोई खास डिज़ाइन नहीं है। इसलिए हम खुद को परिभाषित करने के उद्देश को छू नहीं पाते। हमें वो जीवन मिला है जो हम बनना चाहते है, उस जीवन का नेतृत्व खुद के द्वारा होना चाहिए। किसी के द्वारा चलित जीवन का कभी कोई मूल्य नहीं होता। हम कभी अपने जीवन के समाधानों का स्वयं चुनाव ही नहीं करते, जो हमें परिभाषित करती है। और ये ही जिम्मेवारी का अविश्वसनीय बोझ लेकर हम जीवन जीते रहते है, जिससे हमारी पीड़ा और भी बढ़ती जाती है।
एक इंसान या मनुष्य होने के नाते हमें अपनी मानवीयता को पुनर्स्थापित और पुनर्जीवित करने की सबसे अधिक आवश्यकता है। हमारा जीवन ऐसा होना चाहिए की लोग हमारे साथ सम्मान के साथ दोस्ती कर सके। हमारे पूर्वज जिन्होंने पर्यावरणीय खतरों के जबाब में शारीरिक पीड़ा का अनुभव किया था, वे सभी उसे काम करने में सक्षम हो गए थे, क्योंकि उन्होंने धीरे धीरे दर्द तंत्रिका को विकसित कर लिया था। असल में हम दुःख का अनुभव करने के लिए विकसित हुए, जितना हम भलाई का अनुभव करने के लिए विकसित हुए थे। लेकिन आज हमारा कोई भी दर्द शारीरिक दर्द नहीं रहा। आज हम सभी मानसिक दर्द से पीड़ित है। हमें कभी इस बात की फ्रिक ही नहीं होती की कोई अगर खुद में परिवर्तन करना चाहता है तो उसका स्वागत किया जाएं। हम इतने कायर है की हम स्वयं के प्रति भी कोई क्रांति नहीं लाना चाहते, जबकि मानवीय क्रांति सभी क्रांतियों में मौलिक है। स्वयं की मानवीय क्रांति हमारे दैनिक जीवन से कुछ अलग नहीं है। यह उन चीजों को पहचानने और चुनौती देने के साथ शुरू होती है जो हमारी सकारात्मक क्षमता और मानवता की पूर्ण अभिव्यक्ति को बाधित करते है। ये हमारी दिन -प्रतिदिन वास्तविकता के विशेष चुनौतियों के बीच ही घटित होता है।
एक अच्छा इंसान होना मानवता के विशिष्ट विशेषताओं में से एक चेतना है और ये प्रकृति के सभी जीवों के अंतर्संबधों के सम्मान के साथ होना चाहिए। हमारा जीवन किसी अंतर्निहित गरिमा के बुनियादी विश्वास पर आधारित होना चाहिए। हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक नींव को जंग लग गयी है। पारिणामतः हमारा जीवन संदिग्ध और दमन के स्थिति में पहुंच गया है। हमारा मानवीय जीवन का सार या मानवीय श्रेष्ठ्ता कभी भी किसी धार्मिक या आद्यात्मिक दावों के लिए प्रतिबद्ध नहीं है, ना ही हमारा जीवन कभी इस चीज के लिए कोई अपील करता है। प्राकृतिक विकास में हम सभी मनुष्य स्वयं निर्धारक बन गए है, जो हर परिस्थितियों को प्रभावित करते है। हमने अपने उसी प्राकृतिक इतिहास में ऐसे पैमाने पर हस्तक्षेप किया है जो पहले के सभी ऐतिहासिक क्षणों के लिए अतुलनीय है, जो इस पृथ्वी के इतिहास और विश्व इतिहास के बीच के अंतर को काम कर पाए।
लेकिन, क्या हमने इंसानो -इंसानो के बिच के सामंजस्य की दुरी को मिटा पाए है ? क्या हम सच में दूसरों के लिए सोचते है ? हम बाहरी चीजों के या दूसरे लोगों के इतने प्रभाव में जीते है कि ये जानना मुश्किल हो जाता है की हम खुद के लिए जी रहे है या किसी दूसरो की लिए ? ज्यादातर संभावना इसी बात की है कि हमारी सोच बिलकुल ही हमारी खुद की नहीं है। हम मनुष्य का जन्म शरीर के माध्यम से आनंद की अनुभूति करने के लिए, आनंद का त्यौहार मनाने के लिए ही हुआ है। सारे ब्रम्हांड में चाँद तारे, पेड़ -पत्ते, घास का एक एक तिनका पल पल आनंद का त्यौहार मना रहे है, और एक हम है उदासी, पीड़ा, दुख, विरह का कफ़न ओढ़े हुए ? ब्रम्हांड और प्रकृति का एक हिस्सा होने के नाते भी आनंद, खुशी मनाना चाहिए और उसे दुसरों के साथ भी बांटना चाहिए। अगर हम अपने आतंरिक दुनिया को समझ पाए तो बाहरी दुनिया को भी समझ सकते है, क्योंकि हम अपने आतंरिक दुनिया में जो पाते है वही, वैसा ही हम बाहरी दुनिया में पाते है। एक बार जब हम खुद को समझ लेते है, तो हम दुनिया को भी समझ सकते है।
ये जानना मुश्किल हो सकता है कि हम अपने लिए कब सोच रहे है ? जब तक हम एक समज़दार, बहुत जागरूक व्यक्ति नहीं है, तब तक सबसे अधिक संभावना नहीं है की हमारी सोच खुद की होगी। ऐसा नहीं है की सभी बाहरी प्रभाव हमारे अपने विचारों को बनाने के लिए ख़राब या हानिकारक है, लेकिन खुद के लिए सोचने में असर्मथ होने के कारण हम दुखी, पीड़ित होते जाते है और दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाते है। जरुरी नहीं है की हर चीज़ बुरी है, लेकिन अगर हम सब कुछ आँख बन करके स्वीकार करते है और यथास्थिति पर सवाल नहीं उठाते है तो दिमाग़ क्यों है हमारे पास। इसमें कोई संदेह नहीं है, इन दिनों दुनिया में सभी अराजकता और अनिश्चितता चल रही है, यह महसूस करना मुश्किल हो जाता है की हम अपने स्वयं के जीवन के प्रभारी है। इंसान के जीवन की समस्याएं इतनी महत्वपूर्ण है की मनुष्य उन्हें दूर उनसे बचने की पूरी कोशिश करता रहता है। लेकिन, सिर्फ थोथे शब्द मानव जीवन में दुख की गहराई और तीव्रता को व्यक्त नहीं कर सकते। हम बहुतांश लोग जीवन में परेशानी या समस्याओं के कारण व्यथित है, क्योंकि हममें से कई लोग अपनी आत्मक्षमता महसूस ही नहीं करते। हम भूल जाते है कि हर किसी के पास एक परम क्षमता है। ये बात सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बल्कि प्रकृति के हर चीज़ पर लागु है। मैंने इंसान होने के नाते जो सीखा है वह यह कि सही विकल्प हमेशा सही होते है, बुरे निर्णय केवल तभी बुरे होते है, जब लगता है की वे है। हम अपने जंगली और अनमोल जीवन से ये कभी नहीं पूछते कि क्या महत्वपूर्ण है? हम कभी पूछते ही नहीं क्या हम अपने जीवन का वास्तविक मूल्य पाते है।
अच्छे बुरे अनुभव साथ लेकर चलने वाले हमारे जीवन के सफ़र में हम क्या हासिल करते है ? बहुतो की जीवन किताब कोरी की कोरी ही रहती है, बहोत कुछ अगर लिखा होगा तो थोथे अनुभव, उधार के ज्ञान की आडी -तिरछी लकीरे। अंग्रेजी में कहावत है - Everything is destined to happen. लेकिन उस destiny तक पहुँचने का जो रास्ता है उसे सिर्फ और सिर्फ हम ही चुनते है। हम सभी के जीवन के कुछ हालात ऐसे होते है जिन्हे हम तब तक नहीं समझ सकते, जब तक की खुद उस से न गुजरे।
आप पढ़ने वाले सभी वाचकों का दिल से धन्यवाद। मै जानता इसे समझना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि हर कोई अपने तरीके से जीवन को जीता है, और सबको अपने जीने के तरीके पसंद है। लेकिन जीवन सिर्फ जीना नहीं है, बल्कि उसे जानना है। जीवन जीने में और उसे जानने में बहोत अंतर है। जीवन का सार, उसके मूल्य तभी समझ में आते है, जब हम उसे एकांत की गहराई से सोचते है। उम्मीद है आप मेरे वर्णित लेख से सहमत होंगे। आप सच में चिंतनशील व्यक्ति है तो मेरे अनुभवों को समझ पाएंगे। आप अगर मेरे लेख को पसंद करते है, तो उसे अपने दोस्तों, चाहने वालों के साथ सोशल मीडिया पर साँझा कर सकते है।
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