आपके गांव का वो छोटा सा सरकारी स्कूल अब बंद हो रहा है




क्या आप जानते हैं? या आपको कुछ याद है ? आपके गांव का वो छोटा सा सरकारी स्कूल, जहां आपने पहली ABCD  सीखी थी, अब बंद हो रहा है! हां, दोस्तों आपके बिलकुल सही सुना ? आपने अपना बचपन जिस गांव की स्कूल में बिताया था वो स्कूल  शायद बंद हो गया होगा या तो बंद होने के कगार पर होगा ? हमें पता है ये पढ़ना आपको दुखी कर सकता है। पर सच्चाई यही है दोस्तों ? आपके बचपन का वो स्कूल शायद अब आपके यादों में ही रहेगा। आगे आने वाले कुछ सालों में उसका अस्तित्व पूरी तरह से मिट जायेगा। 


दोस्तों, हो सकता है उसी स्कूल से पढ़ कर आप किसी बड़े पोस्ट पर काम कर रहे होंगे, या आप ने अपना कोई बिज़नेस शुरू किया होगा। लेकिन आपके उस स्कूल को छोड़ने के बाद क्या कभी आपने एक बार भी उस स्कूल को देखा है। हमें पूरा यकींन है दोस्तों आप जब भी उस स्कूल में जायेगे और स्कूल की हालत देखेंगे तो रोये बगैर नहीं रहेंगे। हो सकता हो, आप के वहां पहुँचने तक वो स्कूल ही न बचा हो। 



जिस स्कूल में आप ने अपना बचपन बिताया था और वो शिक्षा हासिल की थी जहां आप आज भी गर्व महसूस करते है क्या उस स्कूल में बच्चे कम हो गए है या सरकार का नजरिया बदल गया है ? आज हम खोलेंगे इस राज को —90s के हजारों स्कूलों से लेकर आज के मर्जर तक की पूरी कहानी। दोस्तों इस ब्लॉग पोस्ट को पूरा अंत तक पढ़िए क्योंकि ये आपके उसी बचपन के यादो की कहानी है। अपने बचपन की यादो की खातिर इस पोस्ट को लाइक जरूर करें अगर आप भी सरकारी स्कूल के स्टूडेंट रहे हैं तो और कमेंट में बताएं: क्या आपके इलाके में भी स्कूल बंद हुए हैं?  तो, चलिए शुरू करते हैं !



सरकारी स्कूल बंद क्यों हो रहे हैं? 


क्या सचमुच गांवों में बच्चे कम हो गए हैं, या फिर शिक्षा को देखने का समाज और सरकार का नजरिया बदल गया है? दिलचस्प बात यह है कि जिन आर्थिक नीतियों के दौर में देशभर में हजारों सरकारी स्कूल खोले गए, उसी दौर ने धीरे-धीरे ऐसी मानसिकता भी पैदा की जिसमें शिक्षा का मूल्य उसके मानवीय और सामाजिक महत्व से नहीं, बल्कि नौकरी और बाज़ार में उसकी उपयोगिता से तय होने लगा। इन स्कूलों की उत्पत्ति में ही उनके बंद होने के बीज भी पड़ गए थे।



दोस्तों, 1990 का दशक—भारत का आर्थिक उदारीकरण का दौर। उस दौर में केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियों और योजनाओं को विश्वबैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने वित्तीय और नीतिगत समर्थन दिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम था District Primary Education Programme (DPEP), जो 1994 में शुरू हुआ। इसका उद्देश्य था प्राथमिक शिक्षा का तेजी से विस्तार करना, खासकर उन जिलों में जहाँ महिला साक्षरता और स्कूल नामांकन बहुत कम था। इस कार्यक्रम को भारत सरकार चला रही थी, लेकिन इसके लिए धन और तकनीकी सहायता World Bank, DFID, UNICEF, European Commission आदि से आई। 



इसी DPEP के तहत नए प्राथमिक विद्यालय खोले गए, स्कूल भवन बने, पैरा-टीचर रखे गए, लड़कियों और दलित-आदिवासी बच्चों के नामांकन पर जोर दिया गया। शिक्षक प्रशिक्षण और पाठ्यपुस्तक में सुधार हुए। बाद में यही मॉडल आगे चलकर सर्व शिक्षा अभियान का आधार बना। 1990 का दशक भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर था। उसी समय Education for All जैसी वैश्विक नीतियाँ भी आईं। विश्वबैंक और अन्य संस्थाएँ विकासशील देशों में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार को बढ़ावा दे रही थीं। इस पर आलोचना भी हुई। कई शिक्षाविदों और चिंतकों ने कहा कि विश्वबैंक की नीतियों ने शिक्षा को न्यूनतम साक्षरता तक सीमित कर दिया, स्थायी शिक्षकों की जगह कम वेतन वाले पैरा-टीचर बढ़ाए गए, शिक्षा का ढाँचा कम लागत वाले मॉडल की ओर गया, और प्राथमिक शिक्षा पर जोर देकर उच्च शिक्षा की उपेक्षा हुई। 



1990 के दशक में भारत को प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए बाहरी वित्तीय सहायता की बहुत ज़रूरत थी। उस समय भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। स्कूलों का ढाँचा बहुत पीछे था और करोड़ों बच्चे स्कूल से बाहर थे। इसलिए World Bank, UNICEF, DFID जैसी संस्थाएँ बड़े पैमाने पर फंडिंग कर रही थीं।



लेकिन 2000 के बाद कुछ बड़े बदलाव हुए। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी, टैक्स संग्रह और सरकारी खर्च की क्षमता बढ़ी। केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षा पर अधिक घरेलू बजट लगाना शुरू किया। सर्वशिक्षा अभियान और बाद में Right to Education जैसे कार्यक्रमों के लिए भारत खुद ज्यादा पैसा लगाने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि बाहरी एजेंसियों की भूमिका मुख्य फंड देने वाले से बदलकर साझेदार या तकनीकी सलाहकार जैसी रह गई। उदाहरण के लिए विश्व बैंक ने बाद में भी शिक्षा परियोजनाओं में निवेश किया, लेकिन अब उसका फोकस लर्निंग आउटकम, डिजिटल एजुकेशन, गवर्नेंस, टीचर ट्रेनिंग आदि पर ज्यादा हो गया। कई योजनाओं में विश्व बैंक ऋण देता रहा, पर भारत की कुल शिक्षा व्यवस्था अब उसके पैसों पर निर्भर नहीं रही।



दरअसल 90 के दशक में जो स्कूल निर्माण अभियान था, वह एक तरह का बुनियादी ढाँचा विस्तार चरण था। बाद के दशकों में समस्या बदल गई। अब सवाल यह नहीं था कि स्कूल है या नहीं, बल्कि यह था कि स्कूल में पढ़ाई कैसी हो रही है? इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहायता भी quantity से quality की ओर शिफ्ट हो गई।



पहले मुख्य फोकस था स्कूल खोलना, भवन बनाना, बच्चों का नामांकन बढ़ाना। अब फोकस है लर्निंग आउटकम, डिजिटल शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट, डेटा आधारित मॉनिटरिंग और शिक्षा को रोजगार से जोड़ना। उदाहरण के लिए हाल के वर्षों में विश्व बैंक ने पंजाब की स्कूल शिक्षा प्रणाली के लिए बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी दी, जिसमें डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, लर्निंग असेसमेंट और साइंस कॉमर्स एजुकेशन पर जोर है। 



विश्व बैंक की भारत के साथ नई पार्टनरशिप फ्रेमवर्क में भी ह्यूमन कैपिटल, स्किल और एजुकेशन रिफॉर्म्स प्रमुख क्षेत्र हैं। एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। 1990 के दशक में भारत अपेक्षाकृत गरीब अर्थव्यवस्था था, इसलिए बाहरी सहायता शिक्षा विस्तार का बड़ा आधार थी। आज भारत खुद कहीं अधिक संसाधन खर्च करता है। इसलिए अब सहायता कुल बजट का छोटा हिस्सा होती है। कई बार यह ग्रांट नहीं बल्कि लो इंटरेस्ट लोन होता है, और इसका उपयोग टार्गेटेड रिफॉर्म्स के लिए किया जाता है।



हाल के दिनों में परिदृश्य बदलने लगा है। अब बहुत से स्कूल जो 90 के दशक में खुले थे, बंद हो रहे हैं। सरकारें तर्क देती हैं कि वे स्कूल बंद नहीं कर रहीं, बल्कि मर्ज या समेकित कर रही हैं। खासकर उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे प्राथमिक और जूनियर स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मिलाया गया है जहाँ छात्रों की संख्या बहुत कम रह गई थी। सरकार के मुख्य तर्क होते हैं कि कई गांवों में 10–20 बच्चों के लिए पूरा स्कूल चल रहा था, शिक्षक संख्या और संसाधनों का उपयोग अप्रभावी था। कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता कमजोर थी और सरकार चाहती है कि बच्चों को बड़े और संसाधनयुक्त स्कूलों में भेजा जाए।



लेकिन आलोचकों के अनुसार, राज्य धीरे-धीरे शिक्षा की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी कम कर रहा है। जब पास का सरकारी स्कूल बंद होता है तो गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ाई छोड़ते हैं, या कम फीस वाले निजी स्कूलों की ओर धकेले जाते हैं। इससे निजी शिक्षा क्षेत्र को अप्रत्यक्ष फायदा मिलता है। गांवों में रोजगार के लिए पलायन बढ़ा, जन्मदर घटी, और बच्चों की संख्या कम हुई है। इसका असर सरकारी स्कूलों पर पड़ा। कई जगह भवन तो रहे लेकिन छात्र कम हो गए। इसके अलावा 90 के दशक के बाद से यह धारणा मजबूत हुई कि सरकारी स्कूल गरीबों के लिए हैं, असली शिक्षा निजी स्कूलों में है। इस मानसिकता ने सरकारी स्कूलों की छात्र संख्या घटाई। जिन परिवारों की थोड़ी भी आर्थिक क्षमता बढ़ी, उन्होंने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना शुरू कर दिया।



कम बच्चों वाले हजारों स्कूल चलाना सरकार के लिए महंगा पड़ता है। भवन रखरखाव, शिक्षकों का वेतन, मिड डे मील, प्रशासनिक लागत आदि खर्चे बढ़ जाते हैं। इसलिए स्कूल कंसोलिडेशन को वित्तीय दक्षता के रूप में पेश किया जाता है। समस्या यह है कि भारत जैसे देश में पास का स्कूल सिर्फ शिक्षा संस्था नहीं, सामाजिक पहुंच का साधन भी होता है। अगर गांव से स्कूल 3–5 किलोमीटर दूर चला जाए तो छोटे बच्चे नियमित नहीं जा पाते, लड़कियों की पढ़ाई ज्यादा प्रभावित होती है और गरीब परिवार जल्दी ड्रॉपआउट करवा देते हैं। यही कारण है कि कई शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता स्कूल विलय नीति का विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि कम छात्र संख्या शिक्षा खत्म करने का कारण नहीं, बल्कि शिक्षा सुधारने का संकेत होना चाहिए।



इस पूरे प्रश्न के पीछे केवल शिक्षा नहीं, बल्कि राज्य की बदलती आर्थिक नीतियाँ, निजीकरण, ग्रामीण संकट और समाज की आकांक्षाएँ सब एक साथ काम कर रहे हैं। 1991 के बाद भारत में जो आर्थिक उदारीकरण हुआ, उसने शिक्षा की सामाजिक भूमिका को काफी हद तक बदल दिया। पहले शिक्षा को राष्ट्र निर्माण, सामाजिक चेतना, नागरिकता और बौद्धिक विकास से जोड़कर देखा जाता था। धीरे-धीरे उसे रोजगार पाने का साधन मानने की प्रवृत्ति मजबूत होती गई। जब शिक्षा का मुख्य उद्देश्य नौकरी बन जाता है, तब समाज और सरकार दोनों की प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं। तब सवाल यह नहीं रह जाता कि गांव में पुस्तकालय है या नहीं, बच्चे इतिहास, दर्शन, साहित्य या विज्ञान को समझ रहे हैं या नहीं, बल्कि सवाल बन जाता है कितने बच्चे employable हैं? कितनों को स्किल ट्रेनिंग मिली? कितनों का placement हुआ? यहीं से शिक्षा के भीतर बाज़ार की तर्क प्रणाली प्रवेश करती है



1990 के दशक के बाद आईटी, मैनेजमैंट, इंजीनियरिंग, कोचिंग कल्चर तेजी से बढ़ा, अंग्रेजी माध्यम को रोजगार से जोड़ दिया गया, सरकारी स्कूल कम अवसर का प्रतीक बनने लगे, और निजी शिक्षा करियर निवेश की तरह पेश की जाने लगी। इस बदलाव का असर यह हुआ कि जिन स्कूलों से सीधा आर्थिक लाभ दिखाई नहीं देता था, वे धीरे-धीरे उपेक्षित होने लगे। खासकर ग्रामीण प्राथमिक विद्यालय।



असल बदलाव शायद यह था कि शिक्षा को मानव निर्माण से हटाकर मानव संसाधन निर्माण के रूप में देखा जाने लगा। शब्द छोटा लगता है, लेकिन दृष्टिकोण बदल देता है। नागरिक की जगह वर्कफोर्स केंद्र में आ जाती है। इसीलिए आज विडंबना यह है कि डिग्रियाँ बढ़ी हैं, कोचिंग उद्योग विशाल हुआ है, तकनीकी संस्थान बढ़े हैं, लेकिन साथ ही सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, पढ़ने की संस्कृति कमजोर हुई है, और शिक्षा का बड़ा हिस्सा रोजगार की अनिश्चितता के डर से संचालित हो रहा है।



सवाल है कि समाज शिक्षा को किस नज़र से देख रहा है। जिस दिन से शिक्षा का मूल्य नौकरी, पैकेज और बाज़ार की उपयोगिता से तय होने लगा, उसी दिन गांव का छोटा स्कूल अनुत्पादक खर्च दिखाई देने लगा। फिर पुस्तकालय, खेल का मैदान, इतिहास, दर्शन, साहित्य और वैज्ञानिक चेतना सब धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए। समाज तब संकट में नहीं होता जब उसके पास धन कम हो, बल्कि तब होता है जब वह मनुष्य को केवल श्रमशक्ति और शिक्षा को केवल रोजगार की मशीन में बदलने लगे। 



2000 के बाद भारत की इकोनॉमी रॉकेट की तरह ऊंचाई छू रही थी।  टैक्स बढ़े, बजट भी बढ़ा लेकिन अब बाहरी फंडिंग पार्टनर बनी, और अचानक फोकस बदला - सरकारी स्कूल खोलना बंद।  ज्यादातर ध्यान डिजिटल एजुकेशन और स्किल्स पर था । अगर ये सब अच्छा था तो आप सोच रहे होंगे, फिर  स्कूल क्यों बंद हो रहे? क्या कम बच्चे स्कूलों जाने लगे  ? या कुछ और कारण  था ?



आज उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सैकड़ों स्कूल 'मर्ज' हो रहे। सरकार कहती है  10-20 बच्चों के लिए पूरा स्टाफ बर्बाद हो रहा है ? बड़े स्कूलों में बेहतर पढ़ाई होती है ! लेकिन आलोचक चिल्लाते रहते हैं—ये निजीकरण का खेल है ! नतीजा, गरीब बच्चे ड्रॉपआउट हो रहे है और प्राइवेट स्कूलों की दुकान चमकती जा रही है । गांवों में पलायन, कम जन्मदर, और वो धारणा: सरकारी स्कूल गरीबों के लिए!"जब सरकारी स्कूल्स बंद होते जा रहे है तो मिडिल क्लास निजी स्कूलों की ओर भागने लगे। हालाँकि निजी स्कूलों का खर्चा मिडिल क्लास के लोगों के लिए एक मुसीबत थी, पर अपने बच्चों के भविष्य के लिए उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई की कोई फिर्क नहीं की  ? बड़े बड़े भवन जैसे स्कूल, चमकती-दमकती बच्चों की लाइफ स्टाइल उन्हें ज्यादा लुभाने लगे। इसी प्रलोभन के चक्कर में सरकारी स्कूलों में गरीब बच्चे कम जाने लगे नतीजन उनके मिड-डे मील भी धीरे  धीरे सरकार ने बंद करना चालू कर दिया !



1991 के उदारीकरण ने सब बदल दिया। पहले बच्चों को जो शिक्षा दी जाती थी उसमे राष्ट्र निर्माण, दर्शन, साहित्य जैसे विषयों को अधिक महत्व था । लेकिन अब? नौकरी, पैकेज, employability जैसे शब्दों से विधार्थियों को ललचाने जाने लगा ! आईटी बूम, कोचिंग कल्चर, इंग्लिश मीडियम जैसे शब्दों ने गरीब मिडिल क्लास के माँ बाप को वो सपना दिखाना शुरू किया, जहा वे अपने बच्चों को एक सक्सेसफुल व्यक्ति के तौर पर देखने लगे, नतीजन सरकारी स्कूल 'लूजर्स' बन गए। मानव निर्माण से 'मानव संसाधन' हो गया। छोटे स्कूल 'अनप्रोडक्टिव' लगने लगे। शहरों शहरों में कोचिंग सेंटर्स की भीड़ दिखने लगी। जॉब प्लेसमेंट के विज्ञापन चौराहे चौराहे पर दिखने लगे। और ये सब शहरो में ही नहीं हो रहा है बल्कि छोटे छोटे गावों में भी दिख रहा है। आज आप देश के किसी  गांव में जाइए और देखिये सारा गांव खाली दिखेगा, कोई बच्चा गांव के स्कूल में पढता हुआ नहीं दिखेगा। और जो स्कूल्ज बचे है वो भी अपनी आखरी सांसे गिन रहे है।  शिक्षा के क्षेत्र में जो नयापण आया है वो कुछ विडंबना भी साथ लेकर आया है जिसमे डिग्रियां बढ़ीं, कोचिंग साम्राज्य बने, लेकिन पढ़ने की संस्कृति मर गयी !



दोस्तों, समस्या सिर्फ स्कूल नहीं, समस्या है समाज का नजरिया ! समाज ने, देश ने इस समस्या की तरफ देखना ही बंद कर दिया। आज किसी को कोई मतलब ही नहीं है की शिक्षा किस स्तर की मिल रही है। जब शिक्षा बाजार की गुलाम बने, पुस्तकालय, खेल मैदान, इतिहास सब हाशिए पर हो और लोग अंधे होकर मौन रहे तो आने वाले कुछ सालों में गरीब क्या साधारण मिडिल क्लास के बच्चों का भी स्कूल में जाना लगभग असंभव हो जायेगा । हमें आज ऐसे  सुधार पर काम करना चाहिए जहां गांव के कम बच्चों वाले सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाया जा सके ताकि उन गरीब बच्चों का स्कूल में जाकर पढ़ने का अधिकार ख़त्म न हो जाये।  



आप क्या सोचते हैं? क्या आज दी जाने वाली शिक्षा सच मे नौकरी का टूल है या इंसान बनाने वाली मशीन ? कमेंट में बताओ! अगर इस ब्लॉग पोस्ट ने आप को थोड़ा बहोत भी सोचने पर मजबूर किया है, तो इसे शेयर, सब्सक्राइब करें और हमें फॉलो भी करे ।


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